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थुम्बा से शुरू हुई भारत की असाधारण अंतरिक्ष यात्रा की पूरी इनसाइड स्टोरी...

थुम्बा से शुरू हुई भारत की असाधारण अंतरिक्ष यात्रा की पूरी इनसाइड स्टोरी...


नई दिल्ली। आज भारत में तीसरा राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस मनाया जा रहा है। आज से ठीक तीन साल पहले यानी 23 अगस्त 2023 को जब चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा फहराया था, तो भारत ने इतिहास रच दिया था। 
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देखा जाए तो यह सिर्फ एक मून लैंडिंग नहीं थी, बल्कि छह दशकों के उस अथक संघर्ष, वैज्ञानिकों की तपस्या और भारत की आत्मनिर्भरता की जीत थी, जिसने केरल के थुम्बा के एक छोटे से लॉन्च पैड से शुरू हुई इस यात्रा को अंतरिक्ष की महाशक्ति में बदल दिया।

एक ऐतहासिक शुरुआत तब की जब भारत के चंद्रमा पर कदम रखा और आज जब हम भविष्य में देखते हैं तो हम गगनयान और अंतरिक्ष स्टेशन की ओर बढ़ रहे हैं। आइए जानते हैं कि थुम्बा के छोटे से लॉन्च पैड से लेकर गगनयान और अंतरिक्ष स्टेशन तक का भारत का यह सफर कैसा रहा? 

शुरुआत से इस गौरवशाली सफर की बात की जाए तो 1960 के दशक की शुरुआत में भारत के पास न तो कोई उपग्रह था और न ही रॉकेट। केरल के थुम्बा में एक छोटी सी जगह से रॉकेट दागने की शुरुआत हुई। 15 अगस्त 1969 को आधिकारिक तौर पर इसरो का गठन हुआ।

इस बात को ऐसे समझिए कि इसरो के संस्थापक विक्रम साराभाई का उद्देश्य सिर्फ अंतरिक्ष की दौड़ में शामिल होना नहीं था, बल्कि यह देखना था कि अंतरिक्ष तकनीक से देश के आम लोगों और विकास कार्यों में कैसे मदद मिल सकती है।

वो समय था साल 1975 का। जब भारत का पहला उपग्रह 'आर्यभट्ट' अंतरिक्ष में भेजा गया। इसके बाद 'साइट' जैसे प्रयोगों के जरिए दूर-दराज के गांवों तक शिक्षा और टेलीविजन पहुंचाया गया।

इसके बाग 18 जुलाई 1980 को एसएलवी-3 (SLV-3) की सफलता ने भारत को उन चुनिंदा देशों में ला खड़ा किया जो खुद के रॉकेट से उपग्रह अंतरिक्ष में भेज सकते थे।

गौर करने वाली बात यह है कि शुरुआत में एएसएलवी (ASLV) जैसे अभियानों में असफलताएं भी मिलीं, लेकिन इसरो ने हार नहीं मानी। गलतियों से सीखकर आगे बढ़ने का यही सिलसिला आज इसरो की ताकत है।

बात यही तक खत्म नहीं हुई जब साल 2008 का था, तब चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर पानी की खोज की। इसके बाद 2013 में भेजे गए मंगलयान ने पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचकर इतिहास रच दिया। ऐसा करने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना। इतना ही नहीं इसरो के भरोसेमंद रॉकेट 'पीएसएलवी' ने न सिर्फ भारत के बल्कि दुनिया भर के कई देशों के उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित किया।

चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता के बाद अब भारत आदित्य-एल1 और अंतरिक्ष में इंसानों को भेजने वाले महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट 'गगनयान' पर काम कर रहा है।

इसके अलावा बड़ी उपलब्धि के तौर पर यह भी रहा कि अंतरिक्ष का मतलब सिर्फ 'इसरो' होता था। लेकिन अब सरकार ने 'इन-स्पेस' के जरिए निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए भी अंतरिक्ष के दरवाजे खोल दिए हैं, जिससे यह सेक्टर और तेजी से आगे बढ़ रहा है।

भारत अब यहीं नहीं रुकने वाला है। आने वाले वर्षों के लिए सरकार और इसरो के बहुत बड़े लक्ष्य तय किए गए हैं।

  • वर्ष 2035 तक- अंतरिक्ष में खुद का भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करना।
  • वर्ष 2040 तक- चंद्रमा की धरती पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री को उतारना।
  • अन्य प्रोजेक्ट्स- चंद्रयान-4 (सैंपल वापसी मिशन), शुक्रयान (शुक्र ग्रह मिशन) और भविष्य का मंगल लैंडर।
गौरतलब है कि थुम्बा के छोटे से रॉकेट रेंज से शुरू हुआ सफर आज चांद के दक्षिणी ध्रुव और उससे भी आगे निकल चुका है। भारत की यह अंतरिक्ष यात्रा सिर्फ विज्ञान की नहीं, बल्कि अटूट मेहनत, दूरदृष्टि और कभी हार न मानने वाले जज्बे की कहानी है।





Edited by k.s thakur...

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