odisha news : मौत के बाद भी सम्मान जारी : अमरदीप अग्रवाल के अमर वचन, जिन्होंने श्मशान को तीर्थ बना दिया...
ओडिशा/बरगढ़,०२/०६(विजय कुमार साहू) : “इंसान को जन्म के समय सम्मान मिलता है, मरने के बाद क्यों नहीं?” - इस सवाल के साथ, बरगढ़ जिले के पद्मपुर के समाजसेवी अमरदीप अग्रवाल का किया काम आज पूरे ओडिशा के लिए एक मिसाल बन गया है। क्या दिक्कत थी?
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पद्मपुर NAC गैसिलेट रोड पर श्मशान घाट की अनदेखी की गई थी। बारिश में घुटनों तक कीचड़ हो जाता था, धूप में छाया नहीं, रात में रोशनी नहीं। नहाने का कोई इंतज़ाम नहीं था। लकड़ी गीली थी, दाह संस्कार में 7 घंटे लगते थे। पैसे न होने की वजह से गरीब लोग बॉडी लेने के लिए घंटों इंतज़ार करते थे।
औरतें अपने बच्चों को गोद में लिए दूर खड़ी रहती थीं। मौत के बाद भी बेइज्जती। अपने पिता के दाह संस्कार के दौरान यह हालत देखकर अमरदीप ने तय किया - “कोई भी अपनों को दोबारा ऐसे अलविदा नहीं कहेगा।” उन्होंने अपने लाखों रुपये खर्च करके "सम्मान कब्रिस्तान प्रोजेक्ट" शुरू किया।
उन्होंने कहा है कि यह काम दो साल तक चलेगा। - दो दशकों से शहर के ज़्यादातर लोग एक छोटी सी ज़मीन पर बने श्मशान घाट में अपने मरे हुए लोगों का अंतिम संस्कार करते आ रहे हैं। NAC के लोगों का इस्तेमाल किया जाने वाला श्मशान घाट दशकों से खराब हालत में था, और दो साल में अमनदीप ने अपने खर्चे पर इसे ठीक करने का काम शुरू किया है।
उन्होंने नहाने के लिए सुंदर इंतज़ाम, सीढ़ियाँ और नहर में पानी जमा करने के लिए एक प्रोजेक्ट बनवाया है। तेज़ गर्मी और बारिश के लिए कोई इंतज़ाम नहीं था। अमर दीप ने वह कर दिखाया है जो सरकार श्मशान घाट के लिए नहीं कर पाई।
उन्होंने अपने पैसे खर्च करके कई दाह संस्कारों का इंतज़ाम किया है। वह तेज़ गर्मी और बारिश में दाह संस्कार के लिए सही इंतज़ाम पर काम कर रहे हैं, जिसमें रेस्ट हाउस, पीने के पानी का सिस्टम वगैरह शामिल हैं। श्मशान घाट को इस डिज़ाइन के साथ पूरा किया जा रहा है कि लोग दीवारों के अंदर दाह संस्कार के बाद सुरक्षित घर लौट सकेंगे।
अपने पिता लक्ष्मी नारायण की याद में कुछ ही दिनों भीतर गेट का काम पूरा करने की कोशिश जारी रखी है। श्मशान घाट के आसपास और पेड़ लगाए जाएंगे। उन्होंने हर दाह संस्कार के बाद परिवार के नाम पर एक पेड़ लगाने का प्लान बनाया है। इस बारे में अमरदीप अग्रवाल कहते हैं, "मैं कोई हीरो नहीं हूं। मैं बस एक इंसान की आखिरी यात्रा को आसान बनाना चाहता हूं।
जिस दिन पद्मपुर में किसी की भी रात दाह संस्कार की चिंता में नींद नहीं आएगी, उस दिन मेरा काम हो जाएगा। जहां सरकारी योजनाएं नहीं पहुंची हैं, वहां अमरदीप अग्रवाल जैसे युवाओं ने इंसानियत का दीया जलाया है। यही असली सेवा है। जो समाज मौत का सम्मान कर सके, वही सभ्य समाज है। आज पदमपुर शहर के लोग इस दाह सत्कार मुश्किल समय में भी अमरदीप के अमर कार्य की कामना कर रहे हैं।
Edited by k.s thakur...



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