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भारतीय भाषा एकता मंच (ILUF) के संयुक्त तत्वावधान में मानबहादुर सिंह लहक सम्मान (2026) तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन को...

भारतीय भाषा एकता मंच (ILUF) के संयुक्त तत्वावधान में मानबहादुर सिंह लहक सम्मान (2026) तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन को...


नई दिल्ली : पेरुमल मुरुगन (Perumal Murugan) एक प्रमुख भारतीय तमिल लेखक, विद्वान और साहित्यिक इतिहासकार हैं। वे ग्रामीण तमिलनाडु की जीवनशैली, संस्कृति, जाति, सामाजिक दबावों और मानवीय संवेदनाओं को अपनी रचनाओं में गहराई से चित्रित करते हैं। 

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पेरुमल मुरुगन का जन्म 15 अक्टूबर 1966 को तमिलनाडु के नामक्कल जिले के तिरुचेन्गोडु के निकट एक छोटे किसान परिवार में हुआ। उनके पिता किसान थे और सिनेमा थिएटर में सोडा शॉप चलाते थे। मुरुगन ने बचपन से ही लेखन शुरू कर दिया था। 

उन्होंने तमिल साहित्य में स्नातक (ईरोड) और स्नातकोत्तर (कोयंबटूर) किया। इसके बाद मद्रास विश्वविद्यालय से एम.फिल. और पीएचडी प्राप्त की। उनकी डॉक्टरेट थीसिस लेखक आर. शनमुगसुंदरम पर केंद्रित थी। वे तमिल साहित्य के प्रोफेसर रहे और नामक्कल, अत्तुर तथा चेन्नई के सरकारी कॉलेजों में पढ़ाया। 

उन्होंने कोन्गुनाडु क्षेत्र की लोक संस्कृति, मुहावरों, लोककथाओं (जैसे अन्नामार सामी) और शास्त्रीय तमिल ग्रंथों पर व्यापक शोध कार्य किया। उनकी गैर-काल्पनिक पुस्तकें कोन्गु क्षेत्र की सांस्कृतिक मानचित्रण के रूप में देखी जाती हैं।

साहित्यिक करियरमुरुगन ने 12 उपन्यास, 6 लघु कथा संग्रह, 6 कविता संग्रह और कई गैर-काल्पनिक पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने कई संकलनों का संपादन भी किया है। उनकी कई रचनाएँ अंग्रेजी सहित अन्य भाषाओं में अनूदित हुई हैं।

मुख्य उपन्यास और अंग्रेजी अनुवाद (कुछ प्रमुख): एरु वेय्यिल (Rising Heat / Eru Veyyil, 1991) — पहला उपन्यास, भूमि अधिग्रहण और परिवार की समस्याओं पर।निझल मुत्रम (Current Show, 1993) — सिनेमा थिएटर में सोडा बेचने वाले लड़के की कहानी।कूलामदारी (Seasons of the Palm / Koolamadari, 2000) — दलित बालक की कहानी; किरियामा पुरस्कार के लिए शॉर्टलिस्ट (2005)।कंगनम (Resolve / Kanganam, 2008) — लिंग-चयन गर्भपात और महिलाओं की कमी पर।

माधोरुबागन (One Part Woman / Madhorubagan, 2010) — सबसे प्रसिद्ध उपन्यास; एक निःसंतान दंपति की कहानी। अंग्रेजी अनुवाद (Aniruddhan Vasudevan) को ILF Samanvay Bhasha Samman और साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार मिला। 

नेशनल बुक अवॉर्ड फॉर ट्रांसलेटेड लिटरेचर (2018) लॉन्गलिस्ट।पूनाची (Poonachi / The Story of a Black Goat, 2017) — एक बकरी की कहानी के माध्यम से समाज चित्रण; नेशनल बुक अवॉर्ड लॉन्गलिस्ट (2020)।

पूक्कुझि (Pyre, 2018) — इंटरनेशनल बुकर प्राइज 2023 लॉन्गलिस्ट; JCB प्राइज शॉर्टलिस्ट।कझिमुगम (Estuary / Kazhimugam) — मध्यम वर्ग और प्रौद्योगिकी पर।अन्य: A Lonely Harvest, Trial by Silence (One Part Woman सीरीज), Rising Heat आदि।उनकी कविताएँ और लघु कथाएँ भी सराही गई हैं। 

2015 में विवाद के बाद उन्होंने "लेखक पेरुमल मुरुगन मर चुका है" घोषणा की, लेकिन बाद में कविताओं के साथ वापसी की।प्राप्त सम्मान और पुरस्कारILF Samanvay Bhasha Samman (2015) — One Part Woman के लिए (भारतीय भाषाओं में लेखन)।Sahitya Akademi Translation Prize (2016) — अनुवादक Aniruddhan Vasudevan को One Part Woman के लिए।

Kiriyama Prize शॉर्टलिस्ट (2005) — Seasons of the Palm।National Book Award for Translated Literature लॉन्गलिस्ट — One Part Woman (2018) और The Story of a Goat (2020)।International Booker Prize लॉन्गलिस्ट (2023) — Pyre।JCB Prize for Literature — Fire Bird (2023)।RNG Sahitya Samman (2023) — साहित्यिक उत्कृष्टता के लिए।

अन्य: Atta Galatta-BLF Award शॉर्टलिस्ट आदि। वे PEN International के वाइस प्रेसिडेंट भी रह चुके हैं।विवाद और वापसी 2014-15 में Madhorubagan (One Part Woman) पर स्थानीय हिंदू और जातीय समूहों ने विरोध किया, जिसके कारण मुरुगन को माफी देने और पुस्तक वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। 

उन्होंने लेखन छोड़ने की घोषणा की, लेकिन मद्रास हाईकोर्ट (2016) ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन किया। इसके बाद उन्होंने पुनः लेखन शुरू किया और नई रचनाएँ दीं। मोहन वर्मा (अमेरिका वासी) लगातार उनकी रचनाओं पर कठोर परिश्रम कर हिंदी में अनूदित कर रहे हैं। 

पुरुमल मुरुगन की मोहन वर्मा द्वारा अनूदित पुस्तकों के नाम हैं -- नर - नारीश्वर, पोन्ना की अग्निपरीक्षा, पोन्ना का अभिशाप एवं छोटू और उसकी दुनिया तथा मुरुगन के कविता संग्रह * कोशैयिन पडालकल * का हिंदी अनुवाद * एक कापुरुष के गीत * मुख्य रूप से शामिल हैं। 

मोहन वर्मा यथासंभव उनकी रचनाओं को हिंदी में लाने के लिए 88 वर्षीय उम्र में भी जूझ रहे हैं। ये उनकी हिंदी के प्रति दीवानगी और साहित्यिक जिजीविषा है। हिंदी लेखकों के लिए पेरुमल मुरुगन जैसे लेखन की एक चुनौती भी है!

वर्तमान में पेरुमल मुरुगन तमिलनाडु में रहते हुए लिखते और पढ़ाते हैं। उनकी रचनाएँ ग्रामीण भारत की वास्तविकताओं, दमन, प्रतिरोध और मानवीय संबंधों को सशक्त तरीके से प्रस्तुत करती हैं। वे समकालीन तमिल साहित्य के सबसे महत्वपूर्ण और लोकप्रिय लेखकों में से एक हैं।




Edited by k.s thakur...

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