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CG news : CGMSC का नया कारनामा ; बिना बजट स्वीकृति के खरीद डालीं 120 करोड़ की दवाएं, वित्तीय अनियमितता पर उठे सवाल...

CG news : CGMSC का नया कारनामा ; बिना बजट स्वीकृति के खरीद डालीं 120 करोड़ की दवाएं, वित्तीय अनियमितता पर उठे सवाल...


रायपुर : छत्तीसगढ़ में सरकारी स्तर पर दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की सप्लाई करने वाली नोडल एजेंसी, छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (सीजीएमएससी) एक बार फिर बड़े विवादों में घिर गई है। 

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इस बार मामला बिना किसी बजटीय मंजूरी के लगभग 120 करोड़ रुपये की दवाएं, रिएजेंट और महंगे चिकित्सा उपकरणों की मनमानी खरीदी से जुड़ा हुआ है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) से मिली जानकारी के बाद स्वास्थ्य विभाग और दवा कारोबारियों के बीच हड़कंप मच गया है।

हैरानी की बात यह है कि स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीएचएस) और संचालक चिकित्सा शिक्षा (डीएमई) की ओर से चालू वित्तीय वर्ष में इस खरीदी के लिए कोई बजट स्वीकृत नहीं किया गया था। 

वित्त विभाग ने भी बिना बजटीय प्रावधान के इस तरह की बड़ी खरीद प्रक्रिया पर पहले ही कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी, लेकिन निगम के अधिकारियों ने इन चेतावनियों को दरकिनार करते हुए खरीद जारी रखी। 

आरटीआइ के दस्तावेजों के अनुसार, इस राशि में से करीब 89 करोड़ रुपये सिर्फ दवाओं और लैब रिएजेंट की खरीदी पर खर्च किए गए, जबकि शेष राशि से अन्य चिकित्सा उपकरण खरीदे गए।

सूत्रों का दावा है कि इस जल्दबाजी में खरीदी गई दवाओं में से लगभग 30 प्रतिशत दवाएं आज भी निगम के केंद्रीय गोदामों में धूल खा रही हैं और उनका वितरण अस्पतालों में नहीं हो सका है। इस प्रशासनिक मनमानी का सीधा और सबसे बुरा असर राज्य के ग्रामीण और छोटे स्वास्थ्य केंद्रों पर देखने को मिल रहा है। 

दवा कारोबारियों और सप्लायरों का आरोप है कि पिछले एक साल से उनका करोड़ों रुपये का भुगतान निगम के पास लंबित है। भुगतान न मिलने के कारण सप्लायरों ने अब नई दवाओं की खेप भेजने से हाथ खड़े कर दिए हैं।

नतीजा यह है कि जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में आवश्यक दर्द निवारक, एंटीबायोटिक और जीवन रक्षक दवाओं तक का भारी संकट पैदा हो गया है और गरीब मरीजों को दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं।

इसके अलावा, सीजीएमएससी में लागू 'फर्स्ट इन फर्स्ट आउट' (फीफो) भुगतान व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। इस नियम के तहत जिन सप्लायरों के बिल पहले आते हैं, उनका भुगतान पहले किया जाना चाहिए। 

लेकिन आरोप है कि पुराने और ईमानदार सप्लायरों को कतार में रखकर कुछ चुनिंदा और रसूखदार कारोबारियों को नियमों को ताक पर रखकर प्राथमिकता से भुगतान किया जा रहा है। इस पक्षपातपूर्ण रवैये से निगम की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और ईमानदारी पूरी तरह सवालों के घेरे में आ गई है।



Edited by k.s thakur...

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